

सुशील शुक्ल
विपक्ष के गले की फांस बनता ईवीएम
विपक्ष का हाल, ‘मीठा-मीठा गप, कडुवा-कडुवा थू’
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अपने देश में जब भी चुनाव होते हैं तब इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) अनिवार्य रूप से चर्चा में रहती हैं। सच तो यह है कि ईवीएम और विपक्ष के बीच शुरू से ही 36 का आंकड़ा रहा हैं। ईवीएम को लेकर विपक्ष की सांप छछूंदर वाली गति हो गई है। विपक्ष न ईवीएम को निगल पा रहा है और न उगल पा रहा है। विडंबना देखिए कि जिस कांग्रेस ने अपने शासनकाल में मतदान के लिए ईवीएम का प्रयोग शुरू किया था वही आज ईवीएम के चरित्र पर सवाल खडे़ करने में तनिक भी नहीं सकुचाती। उस समय भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी और उसने ईवीएम के प्रयोग पर आपत्ति जाताते हुए उसे अविश्वसनीय बताया था । भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ईवीएम के मुख्य विरोधी थे। अब वही भाजपा ईवीएम को पाक-साफ बताने में कोई कोर-कसर उठा नहीं रखना चाहती जबकि कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियां चुनावों में अपनी असफलता का ठीकरा ईवीएम के सिर फोड़ने में जरा भी वक्त नहीं गंवाती। सवाल यह है कि क्या विपक्ष ईवीएम को लेकर अपनी सोच में पूरी तरह ईमानदार है?
भारत में पहले पहल इलेक्ट्राॅनिक मतदान को एक प्रयोग के तौर पर 1998 में अपनाया गया था जब राजस्थान और मध्य प्रदेश की 25 विधानसभा सीटों के लिए इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग करवायी गयी थी। इसके बाद सन् 2001 में तमिलनाडु, केरल, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल की सभी विधानसभा सीटों पर ईवीएम से सफलतापूर्वक मतदान करवाया गया। लोकसभा के लिए आम चुनाव में ईवीएम का प्रयोग 2004 में किया गया जब सभी 543 निर्वाचन क्षेत्रों में इलेक्ट्राॅनिक पद्धति से मतदान सम्पन्न हुआ। इसके बाद से सभी चुनावों में मतदान के लिए ईवीएम का उपयोग किया जाता रहा है।
इस बीच ईवीएम की शुचिता और विश्वसनीय को लेकर समय-समय पर सवाल और आशंकाएँ उठती रही हैं। निर्वाचन आयोग लगातार यह सफाई देता रहा है कि ईवीएम की विश्वसनीयता संदेह से परे है। उसने ईवीएम को संदिग्ध बताने वालों को खुली चुनौती भी दी कि वे आएं और ईवीएम से छेड़छाड़ करके दिखाएं, लेकिन किसी विपक्षी पार्टी ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया। उस पार्टी के मुखिया ने भी नहीं जो स्वयं आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि यही पार्टी एक दशक से अधिक समय से देश की राजधानी में ईवीएम के बूते ही राज कर रही हैं।
ईवीएम पर हमले देश के भीतर से ही हो रहे हों, ऐसा भी नहीं है। अमेरिकी धनपशु एलन मस्क समेत विदेश की धरती से भी ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जाते रहे हैं और हमारे विपक्षी दल ईवीएम से छेड़छाड की संभावनाओं वाले ऐसे दावों और आरोपों को लपक लेते रहे है, बिना इस बात का ख्याल किए कि यह देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और हमारी स्वायत्त संस्थाआंे में अनावश्यक और अनुचित दखलंदाजी है।
यह नहीं कि ईवीएम पद्धति की पारदर्शिता को लेकर उठने वाली शंकाओं को अकेले निर्वाचन आयोग ही निर्मूल बताता है। छेड़छाड़ के आरोपों के साथ ईवीएम की विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में लेकर उसे नकारने और मतपत्रों के माध्यम से चुनाव करवाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत भी इस मसले से दो-चार होती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार ईवीएम के माध्यम से चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की आशंकाओ को नकारते हुए मतदान मतपत्रों के जरिए करवाने की मांग को खारिज किया है।
इस सबके बावजूद यदि विपक्षी दल ईवीएम द्वारा मतदान पर सवाल उठाने से बाज नहीं आते तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि वे देश की सबसे बड़ी अदालत के विवेक और निष्पक्षता पर भी विश्वास करने को प्रस्तुत नहीं हैं? फिर चुनाव आयोग की तो बिसात ही क्या?
इस वर्ष के पूवार्ध में जब लोकसभा चुनाव होने थे, उस समय को याद कीजिए। प्रधानमंत्री समेत भाजपा के सभी नेता ‘‘अबकी बार, चार सौ पार’’का नारा दे रहे थे। तब विपक्ष कह रहा था कि भाजपा का इतने आत्मविश्वास के साथ ऐसा नारा देना या दावा करना इस बार का द्योतक है कि वे इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ईवीएम का सहारा लेंगे। लेकिन हुआ क्या? भाजपा अपने दम पर बहुमत का आंकाड़ों भी नहीं छू पाई और इंडी गठबंधन वाला विपक्ष बहुत सम्मानजनक नहीं तो एक कामचलाऊ संख्याबल के साथ लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्शाने में सफल रहा। ईवीएम की विश्वसनीयता के मसले पर पूरे विपक्ष ने मौन साध लिया! क्यों?
यह कोई पहला अवसर नहीं था जब ईवीएम को लेकर विपक्ष का दोमुंहापन सामने आया हो। केन्द्र सरकार की नाक के नीचे ईवीएम दिल्ली में एक से अधिक बार आम आदमी पार्टी की सरकार बनवा देती है तब वह अच्छी होती है और अगर हरियाणा में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिल जाता है तो ईवीएम संदिग्ध हो जाती है। पंजाब और कर्नाटक में जो ईवीएम ‘सच्चरित्र’ होती है वही ईवीएम राजस्थान और मध्य प्रदेश में ‘दुष्चरित्र’ हो जाती है।
विपक्षी दल आखिर यह क्यों नही सोचते कि ईवीएम को लेकर इस तरह का दोहरा रवैया अपनाकर वे अपनी ही स्थिति को हास्यास्पद बना रहे हैं? यही नहीं, इस तरह के अतार्किक, अवैज्ञानिक और आधारहीन आरोप लगाकर वे दुनिया की नजरों में देश की शीर्ष सवैधानिक संस्थाओं की छवि को घूमिल कर रहे हैं और भारत के सुदृढ़ लोकतंत्र से चिढ़ने वाली विदेशी शक्तियों को भारत की प्रतिष्ठा पर कालिख उछालने का मौका भी दे रहे हैं। किसी व्यक्ति विशेष और दल विशेष को आप नापसंद कर सकते हैं, लेकिन किस कीमत पर? क्या देश की प्रतिष्ठा की कीमत पर ऐसा करना उचित हैं?
विपक्ष को यह समझना ही होगा कि अपनी चुनावी असफलाओं का ठीकरा ईवीएम के सिर पर फोड़कर वे जनता की नजरों में अपनी छवि नहीं चमका सकते। तब तो और भी नहीं जब जनता उनके दोमुंहेपन को साफ-साफ देख पा रही हो।
यदि विपक्षी दलों को ईवीएम या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग प्रणाली पर सचमुच विश्वास नहीं है तों उन्हें अपना दोहरा रवैया छोड़कर चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और स्पष्ट रूप से यह ‘स्टैण्ड’ लेना चाहिए कि वे तब तक चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे जब तक मतदान मतपत्रों के माध्यम से नहीं करवाया जाता। क्या विपक्षी दलों में इतना साहस हैं? क्या वे ‘मीठा-मीठा गप, कडुवा-कडुवा थू’ वाला रवैया त्याग सकते हैं?
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